" मानव जीवन और शून्य "
दुनिया एक मोह माया है इसमे मे जितना उलझोगे उतना उलझते ही जयोगे ।
हम शून्य से आए है शून्य मे ही मिल जाएगें,जिस तरह शून्य का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है उसका कोई मान नहीं होता।
उसी तरह हमारा भी जीवन है यदि आप सोच कर देखेंगे तो आप का भी मरने के बाद कोई अस्तित्व नही होगा।
आप के रिशतेदारों के अलावा आप को कोई नहीं याद रखेगा
आज के अर्थ तंत्र की दौड़ मे इतने अंधे हो चुके है कि वो न जीते जी सुख की प्राप्ति कर सकते है
मरने के बाद उन्हे पूछता ही कौन है,हर कोई अपना स्वार्थ साधना चाहता है
इस दुनिया का हर प्राणी स्वार्थ से लबालब भरा हुआ हो
मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आया जो स्वार्थी न हो
जीवन एक संघर्ष है जब तक आप ये संघर्ष पूरा नहीं करते आप को शून्य मे मिलने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता
जिस तरह शून्य जिस बिन्दु से शुरू होता है उसी पर आकार समाप्त न हो जाये तब तक उसको शून्य कि संज्ञा नही दी जा सकती
उसी तरह मानव जीवन है मेरे प्रिय साथियों
जिस तरह शून्य का स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है उसी तरह मानव जीवन का भी स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है
शून्य का मान तब बढ़ता है जब वो किसी अंक के साथ हो
इसी तरह मानव जीवन भी है जब तक वो किसी दूसरे के काम न आए तब तक जीवन का कोई सार नही
जिस तरह शून्य अपनी परिधि के अंदर कुछ भी करे उसका मान शून्य ही रहेगा
इसी तरह मानव अपने माँ -बाप , धर्म -पत्नी , बच्चों के लिए , रिशतेदारों के लिए कुछ भी कर ले उसका मान शून्य के बराबर ही होगा
ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप ने इस मनुष्य जीवन में प्रवेश किया तब ईश्वर ने आप के ऊपर इनकी नैतिक और व्यवरिक ज़िम्मेदारी दी
ये आप का परम कर्तव्य है
लेकिन यदि आप ने ये कर्तव्य करते -2 पूरा जीवन व्यतीत कर दिया तो
आप उस शून्य के समान ही है जिसका स्वंय का कोई अस्तित्व नहीं है
जब धरती मे एक बीज गिरता है तो अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है
लेकिन वो शून्य मे मिलने से पहले कितने और बीज पैदा कर देता है
क्या वो बीज स्वंय के लिए कुर्बानी देता है ऐसा बिलकुल नहीं है
वो दूसरों के लिए ऐसा करता है
दूसरों का पेट भर सके
लेकिन आज के समाज मे ईर्ष्या ,मानसिक तनाव , लालच आदि इतनी गहराई तक व्याप्त हो गई है कि इस दुनिया मे मानवता , ईमानदारी , इंसानियत तो लुप्त हो गयी है
इन सब से में स्वंय पीड़ित हूँ इसलिए किसी शान्तिप्रिय क्षेत्र का ये छाया चित्र है
जहां मैंने अपना जीवन का सबसे अमूल्य समय गुजारा था
